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2.1 शिक्षा के उद्देश्य
प्राचीन कालीन शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार हैं – (अ) ईश्वर भक्ति तथा धार्मिकता की भावना का विकास
प्राचीन काल में शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में ईश्वर-भक्ति तथा धार्मिकता को विकसित करना था। इसकी प्राप्ति के लिए छात्रों को धार्मिक शिक्षा, धर्मानुकूल आचरण, सन्धावन्दन एवं यज्ञादि क्रियाओं में प्रशिक्षित किया जाता था । (ब) ज्ञान का विकास
ज्ञान को वैदिक काल में तीसरा नेत्र माना गया (शान मनुजस्य तृतीय नेत्र) है, क्योंकि दोनों नेत्र तो दृश्य जगत का ज्ञान करवाते हैं, किन्तु तीसरा नेत्र सूक्ष्म जगत का ज्ञान करवाता
(स) सामाजिक कर्तव्यों का पालन
शिष्यों को उनके सामाजिक कर्तव्यों का ज्ञान करवाना भी वैदिक कालीन शिक्षा के उद्देश्यों में सम्मिलित था । गुरू शिष्यों को उपदेश देते समय माता-पिता को सेवा करना, समाज की सेवा करना तथा गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का पालन करना आदि के बारे में शिक्षा देते थे । (द) चारित्रिक विकास
छात्रों का चारित्रिक विकास करना भी प्राचीन कालीन शिक्षा का उद्देश्य था । चरित्र निर्माण का अर्थ है, धर्मसम्मत आचरण में प्रशिक्षित करना । धर्म के आधार पर छात्र के
आहार-विहार, आचार-विचार आदि का निर्देशित करना ही चारित्रिक विकास माना गया था । प्रारम्भ से ही धर्म तथा नीति शास्त्र की शिक्षा के माध्यम से छात्रों को ब्रह्मचर्य के पालन, इन्द्रिय निग्रह और आत्मनियंत्रण में प्रशिक्षित किया जाता था । (व) व्यक्तित्व का विकास
प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों में व्यक्तित्व विकास के उद्देश्य का भी महत्वपूर्ण स्थान है । आत्म-संयम, आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास आदि सद्गुणों को उत्पन्न करके इस उद्देश्य की प्राप्ति की जाती थी । विभिन्न प्रकार के आयोजनों के द्वारा छात्रों में विवेक, न्याय और निष्पक्षता जैसे गुणों का विकास किया जाता था । वाद-विवाद, शास्त्रार्थ, गोष्ठियों, सम्मेलन आदि सामूहिक कार्यक्रमों को व्यक्तित्व विकास के लिए आयोजित किया जाता था । (र) संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार ।
प्राचीन काल की शिक्षा का उद्देश्य संस्कृति का संरक्षण तथा हस्तान्तरण करना भी था उस समय रहन-सहन, खान-पान, रीति रिवाज और मूल्य सभी धर्म पर आधारित थे । गुरूकुलों की कार्यप्रणाली धर्म प्रधान थी । छात्रों को वेद मन्त्र सिखाना,संस्कार प्रदान करना
आदि के द्वारा संस्कृति की नींव रखी गई । (ल) चित्त-वृत्ति निरोध
शरीर की अपेक्षा आत्मा को अधिक महत्व प्रदान करना भी प्राचीन कालीन शिक्षा का उद्देश्य था । उस समय यह माना गया कि शरीर नश्वर है तथा आत्मा शाश्वत है | अत:
75 आत्मा के उत्थान के लिए तप, जप और योग द्वारा चित्त वृत्तियों का निरोध किया जाना चाहिए |
स्वमूल्यांकन प्रश्न 1.प्राचीन कालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या है? 2.चित्त- वृत्ति निरोध से आप क्या समझते है ? 3.ज्ञान को मनुष्य का तृतीय नेत्र क्यों कहा गया है?
5.2.2 शिक्षा का प्रशासन तथा वित्त | 1. राज्य के नियन्त्रण से मुक्त।
प्राचीन काल में शिक्षा की व्यवस्था करने का उत्तरदायित्व राज्य का नहीं था और न ही राज्य का शिक्षा पर कोई नियंत्रण था । तत्कालीन शिक्षा पूर्ण रूप से गुरुओं के नियन्त्रण में थी ।
2. निःशुल्क शिक्षा
| गुरूकुल में दी जाने वाली शिक्षा पूर्णत: निःशुल्क थी । छात्रों के आवास एवं भोजन का प्रबन्ध भी गुरू स्वयं करते थे । 3. शिक्षा की वित्त व्यवस्था
धनाढ्य वर्ग के लोग, राजा-महाराजा गुरूकुलों को स्वेच्छा से दान देते थे । दान में भूमि, पशु, अन्न, वस्त्र, पात्र तथा मुद्रा आदि दिये जाते थे । यह दान शिक्षा की आय का स्त्रोत था । साथ ही गुरूकुल की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शिष्य समाज से नित्य भिक्षा माँग कर लाते थे । शिक्षा समाप्ति के पश्चात् गुरूओं को शिष्य अपनी सामर्थ्यानुसार गुरू दक्षिणा देते थे, यह भी गुरूकुल का वित्तीय साधन था । 5.2.3 शिक्षा का स्वरूप
प्राचीन काल में शिक्षा दो स्तरों में विभक्त की गई थी – प्रारम्भिक शिक्षा और उच्च
शिक्षा | (अ) । प्रारम्भिक शिक्षा
प्राचीन काल में प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही सम्पन्न करवाई जाती थी । बालक जब 5 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता था तो किसी भी शुभ दिन उसका “विद्यारम्भ संस्कार किया जाता था । परिवार का कुल-पुरोहित बालक को नहाने एवं नवीन वस्त्र पहनने के पश्चात् यह संस्कार आरम्भ करता था | कुलपुरोहित नया वस्त्र बिछाकर उस पर चावल रखकर वेद मन्त्रों द्वारा देवताओं की अराधना करता था तथा बालक की उंगली पकड़कर चावलों में वर्णमाला के अक्षर बनवाता था । इसके लिए कुलपुरोहित को दक्षिणा दी जाती थी तथा वह बालक को आशीर्वाद देता था और प्रारम्भिक शिक्षा नियमित रूप से होने लगती थी । (ब) उच्च शिक्षा
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प्राचीन काल में उच्च शिक्षा का केंद्र गुरूकुल थे । इसके लिए छात्रों को गुरू के समीप ले जाया जाता था । गुरूकुल प्रवेश के समय छात्रों का “उपनयन संस्कार होता था। इसके बाद उच्च शिक्षा प्रारम्भ होती थी । 5.2.4 शिक्षण संस्थाएँ
प्राचीन काल में शिक्षण का कार्य मुख्य रूप से गुरूकुल जाता था । बौद्ध-काल गुरूकुल स्थान पर मत या विहार शिक्षण-संस्था के रूप में कार्य करते थे | प्राचीन काल में औपचारिक शिक्षण-संस्था अर्थात् गुरूकुल का निर्माण प्राय: शहर के कोलाहल से दूर जंगल के एकांत परन्तु रमणीय स्थानों पर किया जाता था । गुरूकुल में छात्रों को सरल जीवन व्यतीत करना होता था। गुरूकुल में प्रवेश के बाद शिष्य को ब्रह्मचारी कहा जाता था । गुरूकुल के अतिरिक्त भी शिक्षण संस्थाएँ प्राचीन काल में प्रचलित थी जो इस प्रकार हैं(अ) टोल – टोल में केवल एक शिक्षक होता था, तथा शिक्षण कार्य संस्कृत भाषा में किया
जाता था । (ब) चरण – चरण में वेद के एक अंग की शिक्षा दी जाती थी । एक चरण में एक शिक्षक
होता था । घटिका – घटिका में धर्म और दर्शन की उच्च शिक्षा दी जाती थी । एक घटिका में अनेक शिक्षक होते थे । परिषद – परिषद में विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी । एक परिषद में
सामान्यत: दस शिक्षक होते थे । (य) गुरूकुल – गुरूकुल में वेदों, साहित्य, धर्मशास्त्र आदि की शिक्षा प्रदान की जाती थी ।
एक गुरूकुल में एक शिक्षक होता था । (र) विद्यापीठ – विद्यापीठ में व्याकरण तथा तर्क की शिक्षा दी जाती थी । एक विद्यापीठ
में अनेक शिक्षक होते थे । विशिष्ट-विद्यालय – विशिष्ट-विद्यालय में एक विशिष्ट विषय की शिक्षा दी जाती थी, जैसे – वैदिक विद्यालय में वेदों की और सूत्र विद्यालय में यहाँ, हवन आदि की शिक्षा दी जाती थी । एक विशिष्ट विद्यालय में एक ही शिक्षक होता था । मन्दिर महाविद्यालय – किसी मंदिर से सम्बद्ध महाविद्यालय में धर्म, दर्शन, वेद, व्याकरण आदि की शिक्षा दी जाती थी । इसमें अनेक शिक्षक होते थे । ब्राह्मणीय महाविद्यालय – इस महाविद्यालय को “चतुष्टणकी” भी कहा जाता था क्योंकि इसमें “चारों शास्त्रों’ ‘ अर्थात् दर्शन, पुराण, कानून और व्याकरण की शिक्षा दी
जाती थी । 5.2.5 शिक्षा का पाठ्यक्रम

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